आज फिर ऐसा दीप जलायें

आज फिर ऐसा दीप जलाएं
बरसों से बोझिल मन को,
एक नई उमंग दे जाए,
कलुषित वृत्ति बुझा ना पाए।
हिया की जलती लौ को,
छल निर्लिप्त मानव मन,
परास्त करें निज ज्योति से,
आज फिर ऐसा दीप जलाएं।

लौ की अग्नि शक्ति बन,
संचित हो ऊर्जा जीवन की,
प्रहारों को निर्थक कर दे,
प्रचंड प्राण में संयम दे के,
चिर विश्वास निर्मित कर जाए
आज फिर ऐसा दीप जलाएं।

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तुम कहते हो गीत सुनाओ

अंखियां बोझिल है अंसुओं से,
तुम कहते हो गीत सुनाओ।

अपने मन में सुमन खिलाए,
मुझको कांटों में उलझाए।
मैंने जेठ दोपहरी पाई,
तुम कहते हो मधुमास मनाओ।

अंखियां बोझिल है आंसुओं से,
तुम कहते हो गीत सुनाओ।

तोड़ दिया हृत तंत्री वीणा,
उर में दी आहों की पीड़ा,
मैंने अनगिन झंझा पाई।
तुम कहते हो साज़ सजाओ।

अंखियां बोझिल है अंसुओ से,
तुम कहते हो गीत सुनाओ।

अपने नित त्योहार मनाया,
बना वर्तिका मुझे जलाया
हमने रैना समां की पाई,
तुम कहते हो दीप जलाओ “सजाओ”

अंखियां बोझिल है अंसुओ से,
तुम कहते हो गीत सुनाओ।

जुगल किशोरी सिंह

अपने इर्द गिर्द से दो लाइनें,

उन लोगों के लिए जो योग्य न होकर भी किस्मत से दोनों हाथों से बटोरेते है पर मेहनत से आगे बढ़ने वाले का जीवन कष्टमय बनाने में बेहद योगदान करते हैं।

कौन कहता है कि किसी
चट्टान से मजबूत इरादे
को तोड़ा नहीं जा सकता,
बशर्ते
तोड़ने वाला तुम सा हो।
बेरहम, बेशुक्रगुजार और बेपरवाह
उस काएनात का
जिसने बख़्शा है तुम बेशुमार।